17 February 2026

A couple of days at ICAAA & 53rd OMS

 So last week I went to the  International Conference on "Advances in Analysis and its Applications" & 53rd Annual Conference of OMS held at IMA. It was my second time at IMA (I once mentioned that that conference might have been useful after all, but on further checking the litreaure the links never materialised) , but people have already started to think that I did my BSc at IMA due to familiarity with the routes to and fro from NIESR to IMA as well as the inner workings of IMA.

The conference itself was lacklustre, many applied talks that were very, very relaxed about regounress. and the parallel sessions were ill thought out (they were not grouped by either Age or Topic, what criteria they came up with, or they were able to conjure up a true RNG machine after IISC is beyond me). 

In short didn't actually learn much, for most talks were tangential to what I do. I did get to see my academic grandfather and Shanti Swarup Bhatnagar Awardee Gadadhar Misra. His talk was interesting, on Grothendieck's constant. Last time at IMO de didn't present anything but were just some sort of chief guest or organiser. Neither time did I have the courage to introduce myself, but my seniors here too haven't done that yet. Time will come, surely. Sudarsan Nanda's talk was also intresting and it was also very rich with personal anecdotes with G Das.

G Das is apparently a titan of Odia mathematics and perhaps indirectly responsible for my own PhD. I had the fortune to see him at the last conference at IMA. I didn't really recognise that then, my main takeaway was a joke at the expense of his son's name (Epsilon Das). 'बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद'  and all that. Anyway, at OMS, they do seemto respect the elders a lot. 



Moving to the more practical side, the food was better, and we got a bag a odia magzine and a printed version of JOMS. My first printed Journal! 

I do want to attend National Conference on Geometric Function Theory and Special Functions (NCGFTSF 2026), which is more aligned with my research area, but there seems to be some scheduling issue with my mid sem exams. I only hope it works out. 


13 February 2026

Review: ख़ामोश! अदालत जारी है

ख़ामोश! अदालत जारी है [Khamosh! Adalat Jari Hai] ख़ामोश! अदालत जारी है [Khamosh! Adalat Jari Hai] by Vijay Tendulkar
My rating: 1 of 5 stars



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पहली बार इस नाटक का नाम मैंने गिरीश कर्नाड की Collected Plays: Tughlaq, Hayavadana, Bali: The Sacrifice, Naga-Mandala, Volume 1 में देखा था। दोनो हो नाटककार समकालीन थे, दोनों ने ही भारतीय नाटकों में नए नए प्रयोग लाए थे, और दोनों का तुलनातमक विश्लेषण करना एक तरह का फ़ैशन मालूम पड़ता है। दोनो ने ही अलग भाषाओं में नाटक लिखा था जिसका मैने अनुवाद ही ग्रहण किया।

मेरे मत में समानताएँ यहीं तक सीमित हैं। कर्नाड की रचनाएँ एक परंपरा से जुड़ी प्रतीत होती हैं, जो यक्षगान आदि से उनके काम को जोड़ती है; जबकि, तेंदुलकर का यह नाटक एक जर्मन उपन्यास Traps का ही मराठी रूपांतरण है। ये बात नहीं कि देशकालीकरण मुझे स्वीकार नहीं, Three Men (not) in a Boat: and most of the time without a dog एक अच्छी कोशिश थी Three Men in a Boat के जादू को फिर से दोहराने की, लेकिन ये अच्छे से नहीं किया गया इस बार।

अब शायद इसका कारण गर्भांक और अतिनाटकीयता रहा हो जो इसे अत्यधिक बोझिल के दे रहा है, या पात्रों का वार्तालाप अत्यधिक, किसी अधिक उपयुक्त शब्द के अभाव में कहूँ तो,‘ड्रामैटिक’ लगा हो। वैसे भी, यह माध्यम की एक स्वाभाविक सीमा हैये दिक्कत तो वैसे था माध्यम की ही है, ज्यादा होता नहीं कि नाटक पढ़ के मन में अच्छा लगता है। शायद कर्नाड का Shadi Ka Albam पढ़नी चाहिए आगे जब अनुधिक भारतीय नाटक पढ़ने का मन हो।

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08 February 2026

Review: Enthralled By You

Enthralled By YouEnthralled By You by Angela Pearse
My rating: 3 of 5 stars

I received an ARC copy for this, like I did for the first book in the series Flossed In Love. My main complaints with the first book were its short length and ending at the high stakes cliffhanger. This book is even shorter, and while it resolves the cliffhanger, it loses all the built up tention from the last book. Big events happen, but they feel anticlimactic. Take transformations into a vampire for example, in the first book, we see only one transformation and another character weighing on another potential transformation formed much of the plot for it. In this part, however, we see 4 back to back transformations and another in the flashback! None of which held the seriousness or gravitas or even time devoted to Floss' transformation. Still, it is a very quick read, but the main gain from the book is resolving the initial cliffhanger and introducing a new set of characters for the final instalment of the trilogy Biting My Knight, which I do plan to read. Hopefully, the last book will raise the standards.

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29 January 2026

मत पढ़ो Nooh के बारे में

 

Don’t Play With Nooh अंग्रेज़ी शीर्षक वाली एक करीब करीब हिन्दी में लिखी गई कहानी है। लेखक (जो अज्ञात है कितनू प्रतिलिप्याधिकार एक असाद के पास है, अब जिसे जो सोचना है सोचे) के अनुसार वो ना तो हिंदी में निपुण है ना ही अंग्रेजी में, इसलिए ये ' हिंदुस्तानी' में लिखा जा रहा है। अगर हिन्दी उर्दू के बाद अंग्रेज़ी भी मिला दी जाए तो ज़रूर हिन्दुस्तानी है ये, लेकिन शायद हिंग्लिश कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। एक बार विश्वविद्यालयों की आधुनिक पंचमेल खिचड़ी का ज़िक्र किया था, वो ही बोली है इसमें। कहानी AMU की है, छाप तो है लेखन में। छपा हुआ देख कर ही महसूस होता है कि हमारी हिन्दी को कितना अटपटा कर दिया है अंग्रेज़ी ने। Cat तक हमे रोमनलिपि में अंग्रेज़ी में लिखना हो रहा है। लेकिन अच्छा या खराब, आज ये युवाओं की बोली में ही ये किताब है।

Notion Press से प्रकाशित है और स्वप्रकाशन की झलक साफ दिखती है त्रुटियों में । चन्द्रबिन्दु नहीं है कहीं भी, माना कि लोकाचार में पंचमाक्षर, अनुस्वार और अनुनासिक के उच्चारण में भिन्नता का लोप हो गया है (संभवतः आदिशंकराचार्य के भज गोविन्द के प्रभाव से), कहीं पे अर्धचंद्रबिंदु लिखा गया है और कहीं तो कुछ नहीं (अदर्शनं लोपः)। शकार के स्थान में षकार का प्रयोग है। जब पहेली पहेली बार विंडोज़ में देवनागरी लिखता था तो ऐसा ही होता था। आजकल तो आईआईटी कानपुर के WX notation से लिखता हूं। आखिर वैज्ञानिक बुद्धि ही काम आई। एक तरह से ये सारी त्रुटियां हिंदी भाषा के क्षय जिसका वर्णन ऊपर किया उसपे ही एक तरह की अनजाने में नाटकीय विडंबना है। बहुत इधर उधर मुंह मारने के बाद ये चुना है। और मोबाइल में तो गूगल कीबोर्ड सही है देवनागरी के लिए।

खैर महज़ भाषा से ही दिक्कत न थी मेरी, अन्यथा 10 पृष्ठ पढ़ के न छोड़ता किताब। खैर गम नहीं, सिर्फ 30 32 की किताब मिल गई थी ये मुझे। 

गुमनाम लेखक (जो शायद असाद हो सकता है) की ये आपबीती कहानी है। वो वाचक भी है और एक पत्र भी। दोनों में भी काफी irritating सा महसूस होता है। बकौल स्नेप के "Insufferable know-it-all"। 

ये किताब भी अभी तक है नहीं GR में, हालांकि की बाईआल की कविता संग्रह पे जो इधर लिखा था अब उसका एक अंश GR में डाल दिया है। जब तक नहीं आ जाता ये भी उधर, तब तक ये ही सही। 

1/5 सितारे 


21 January 2026

" ऊपर वाला जब भी देगा देगा छप्पर फाड़ कर "

राज नारायण पाण्डेय, Bcom, BCA, IAS cum BDO (Deputation) लेगांव, अभी कुछ एक दिन पहले ही ट्रैनिंग के दौरान ग्रुप बी पोस्ट में डेप्युटेशन में लेगांव आए थे। ताउम्र तो दिल्ली में रहे थे, बोल चाल सब दिल्ली वाली ही थी लेकिन कैडर यूपी का मिला था। दिल्ली के करीब 50 किलोमीटर ही दूर था ये लेगांव लेकिन जीवंतशैली तो शायद 50 साल दूर थी। बचपन में तो दूरी मिनटों में ही सुनते आएं थे अपने पाण्डेय बाबु, किन्तु युवावस्था में मैट्रो स्टेशनों की गिनती ने अपने आप को एक बड़े इलाके में इकलौता मापदंड जामा लिया था। लेकिन लेगांव मैट्रो स्टेशन कहां? कितने ही लोग है इधर जो मैट्रो जानते भी हों? दिल्ली मैट्रो क्या, दिल्ली की बोली भी क्या बोल पाते हैं ये लोग? 

भाषा तो हिंदी ही है। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी की नहीं, पाण्डेय बाबु ने तो केवल NCERT में सुना था ये सब जो बोलते हैं ये। शायद प्रेमचन्द्र के अनुयाई हैं। क्या मज़ाक है? 35% साक्षात्कारता है ग्राम में महज़। प्रेमचन्द्र ना इधर के लोग जानते हैं न शायद इनकी आनेवाले 2 पीढियां जान पाएंगी।

कैसे जानेंगे? विद्यालय, जिसको आम लोग ईस्कूल कहते हैं, तो एक है इधर किन्तु केवल लड़कियों के लिए, लड़कों को पास के गाँव में जाना होता है। इस ईस्कूल की भी हालत जर्जर है, अध्यापक 2 हैं, पिऊन भी 2। 4 लोग मिल के घंटों निकाल देते हैं 29 खेलने में। पाण्डेय बाबु तो दिल्ली में कभी पत्ते छुए ना थे, पर अब हर दूसरे दिन ईस्कूल का दौरा मार कर 20 30 हाथ ये भी खेल लेते हैं। इन्हें देखकर उमर में छोटा पिऊन खुद खड़ा हो जाता है तो किसी बच्ची को चाय बनाने भेज देते है। पढ़ाई भले न हुए इधर, पूरे गांव में तीसरी कक्षा की लड़कियां ही सबसे अच्छी चाय बनाती हैं। तीसरी कक्षा कहना शायद ठीक नहीं, 8 या 9 ही तो आते हैं, बच्चियां एक साथ पढ़ती हैं और नवयुवतियां एक साथ। इम्तेहान नाममात्र का ही होता है। ये लड़ियां ही तनिक खड़ीबोली जानती नहीं। 

खड़ीबोली जानती हो या न जानती हो, पाण्डेय बाबु को ज्यादा दिक्कत इस बात से हे कि ये लोग 5 मिनिट बिना मुहावरों के बोल नहीं सकते। व्याकरण में मुहावरों  सार्थ याद रखने होते थे मैट्रिक तक । मुहावरों और लोकोक्तियों में अंतर तो पाण्डेय बाबु आज भी नींद में बोल सकते हैं – 1 और 3 नंबर दोनों के हिसाब के। लेकिन कवि क्या कहना चाहता है ये प्रश्नपत्रों तक ही छोड़ दिया जाए ये पाण्डेय बाबू का मत है। लेकिन लेगांव में तो हर एक संवाद ही किसी अपठित गद्यांश सा महसूस होता।लेकिन डेप्युटेशन तो 2 महीने की ही है, गिन के 18 दिन बाकी है। एक बार लेगांव से निकल जाए तो सभ्यता के बीच पाण्डेय बाबू अपनी ज़ुबान सुन पाए। 

वैसे इतना बुरा भी नहीं लेगांव। ईस्कूल की छत पर दुपहर में धूप सेकते हुए पिऊन से चंपी करने में एक अलग ही आनंद है। मुखर्जीनगर की थकान धीरे धीरे निकलते जाती है इस तरह। ख्यालों में पाण्डेय बाबू खो ही रहे थे कि एक छात्रा आई, शायद 6 या 7 साल की होगी, और पिऊन के बगल में जाके बैठकर एकटक अपने बीडीओ को निहारने लगी। ज़ुबान में बात थी एक और दिल में वो देहाती बेबाकपन लेकिन फिर भी भारत सरकार के इस सेवक से बात चालू करने में एक झिझक थी । लेकिन देख ले लग रहा था कि जैसे ही पांडेय बाबू एक शब्द बोल दें, न्यूटन के पहले सिद्धांत से ये रुकने वाली न है। 

पाण्डेय बाबु भी बोरियत के मारे नाम पूछ लिए उससे। सीता, गीता या कुछ ऐसा ही कहा। पाण्डेय बाबू को कुछ खास मतलब नहीं था जवाब से, शायद बाद अपनी ही आवाज सुननी थी। फिर 10 12 मिनट रीता ने, उसका नाम रीता था अब तक पाण्डेय बाबू को एहसास हो गया, ने उसके घर में कितनी बकरियां हैं (4), कितने भाई हैं (2), और मां बाप कैसे रहते हैं (बीच बीच में काफ़ी गाली गालोच होती है) सब बता दिया। बीच में वो बोली कि उसकी मां कहती फिरती है कि " ऊपर वाला जब भी देगा देगा छप्पर फाड़ कर "। ये मुहावरा हमेशा से पाण्डेय बाबू को अटपटपा लगता। छप्पर फाड़ ये क्यों देना लेकिन भला, क्या भगवान ऊपर से ही वस्तु देगा ये सवाल उसका बचपन से था। पाण्डेय बाबू ने रीता से ये ही बात पूछ ली। जब स्वर्ग ऊपर है और भगवान स्वर्ग में तो समान तो ऊपर से ही आयेगा ना। रीता के इस तर्क में दम तो था। इनमस्वरूप रीता को एक पांच का सिक्का नसीब हुआ। और पाण्डेय बाबू? ताश की एक और बाज़ी खेलने चल दिए।

2 हफ्ते बीत गए, अब तो समान ही बंधा जा रहा था। पंचायत के उपप्रमुख का साला खुद पाण्डेय बाबू का समान बांध रहा था। लेकिन उस दिन फिर वो लड़की दिखी, गीता रीता या जो भी। पाण्डेय बाबू को फिर खप्पर वाली बात याद आ गई। इतनी छोटी उम्र में ही ऐसे बेतुक मुहावरें क्यूं बोलने लगते है ये लेगांव के बच्चे? अब व्हेन इन रोम... 

वैसे आज ताश बंद है। ईस्कूल की छत चू रही है और कल रात भयंकर बारिश हुई थी। पांडेय बाबू के क्वार्टर के बाहर सभी लड़कियां खोखो खेल रहें हैं। लेकिन ये मौसम तो चाय की फरमाइश करता है। पाण्डेय बाबू जेब से दस का नोट निकल के रीता को बुलाते हैं, वो चूल्हा जला के चाय बनाने में लग जाती है। चाय चढ़ाते हुए रीता कुछ बुदबुदाई
“ऊपर वाला जब भी देगा देगा छप्पर फाड़ कर।

उत्तरलेख

पाण्डेय बाबू को भांति में ही इस मुहावरे का पदार्थ ये ही समझ रहा था आज तक। नितिन नबीन के लिए डीके की हिदायत में जब इस अंग्रेज़ी अनुवाद होता है तब इसका अलसी अर्थ जाना, घर फर्श से छत तक भर जाएगा और इतना भरेगा कि शायद छत ही टूट जाए। 

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