भाषा तो हिंदी ही है। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी की नहीं, पाण्डेय बाबु ने तो केवल NCERT में सुना था ये सब जो बोलते हैं ये। शायद प्रेमचन्द्र के अनुयाई हैं। क्या मज़ाक है? 35% साक्षात्कारता है ग्राम में महज़। प्रेमचन्द्र ना इधर के लोग जानते हैं न शायद इनकी आनेवाले 2 पीढियां जान पाएंगी।
कैसे जानेंगे? विद्यालय, जिसको आम लोग ईस्कूल कहते हैं, तो एक है इधर किन्तु केवल लड़कियों के लिए, लड़कों को पास के गाँव में जाना होता है। इस ईस्कूल की भी हालत जर्जर है, अध्यापक 2 हैं, पिऊन भी 2। 4 लोग मिल के घंटों निकाल देते हैं 29 खेलने में। पाण्डेय बाबु तो दिल्ली में कभी पत्ते छुए ना थे, पर अब हर दूसरे दिन ईस्कूल का दौरा मार कर 20 30 हाथ ये भी खेल लेते हैं। इन्हें देखकर उमर में छोटा पिऊन खुद खड़ा हो जाता है तो किसी बच्ची को चाय बनाने भेज देते है। पढ़ाई भले न हुए इधर, पूरे गांव में तीसरी कक्षा की लड़कियां ही सबसे अच्छी चाय बनाती हैं। तीसरी कक्षा कहना शायद ठीक नहीं, 8 या 9 ही तो आते हैं, बच्चियां एक साथ पढ़ती हैं और नवयुवतियां एक साथ। इम्तेहान नाममात्र का ही होता है। ये लड़ियां ही तनिक खड़ीबोली जानती नहीं।
खड़ीबोली जानती हो या न जानती हो, पाण्डेय बाबु को ज्यादा दिक्कत इस बात से हे कि ये लोग 5 मिनिट बिना मुहावरों के बोल नहीं सकते। व्याकरण में मुहावरों सार्थ याद रखने होते थे मैट्रिक तक । मुहावरों और लोकोक्तियों में अंतर तो पाण्डेय बाबु आज भी नींद में बोल सकते हैं – 1 और 3 नंबर दोनों के हिसाब के। लेकिन कवि क्या कहना चाहता है ये प्रश्नपत्रों तक ही छोड़ दिया जाए ये पाण्डेय बाबू का मत है। लेकिन लेगांव में तो हर एक संवाद ही किसी अपठित गद्यांश सा महसूस होता।लेकिन डेप्युटेशन तो 2 महीने की ही है, गिन के 18 दिन बाकी है। एक बार लेगांव से निकल जाए तो सभ्यता के बीच पाण्डेय बाबू अपनी ज़ुबान सुन पाए।
वैसे इतना बुरा भी नहीं लेगांव। ईस्कूल की छत पर दुपहर में धूप सेकते हुए पिऊन से चंपी करने में एक अलग ही आनंद है। मुखर्जीनगर की थकान धीरे धीरे निकलते जाती है इस तरह। ख्यालों में पाण्डेय बाबू खो ही रहे थे कि एक छात्रा आई, शायद 6 या 7 साल की होगी, और पिऊन के बगल में जाके बैठकर एकटक अपने बीडीओ को निहारने लगी। ज़ुबान में बात थी एक और दिल में वो देहाती बेबाकपन लेकिन फिर भी भारत सरकार के इस सेवक से बात चालू करने में एक झिझक थी । लेकिन देख ले लग रहा था कि जैसे ही पांडेय बाबू एक शब्द बोल दें, न्यूटन के पहले सिद्धांत से ये रुकने वाली न है।
पाण्डेय बाबु भी बोरियत के मारे नाम पूछ लिए उससे। सीता, गीता या कुछ ऐसा ही कहा। पाण्डेय बाबू को कुछ खास मतलब नहीं था जवाब से, शायद बाद अपनी ही आवाज सुननी थी। फिर 10 12 मिनट रीता ने, उसका नाम रीता था अब तक पाण्डेय बाबू को एहसास हो गया, ने उसके घर में कितनी बकरियां हैं (4), कितने भाई हैं (2), और मां बाप कैसे रहते हैं (बीच बीच में काफ़ी गाली गालोच होती है) सब बता दिया। बीच में वो बोली कि उसकी मां कहती फिरती है कि " ऊपर वाला जब भी देगा देगा छप्पर फाड़ कर "। ये मुहावरा हमेशा से पाण्डेय बाबू को अटपटपा लगता। छप्पर फाड़ ये क्यों देना लेकिन भला, क्या भगवान ऊपर से ही वस्तु देगा ये सवाल उसका बचपन से था। पाण्डेय बाबू ने रीता से ये ही बात पूछ ली। जब स्वर्ग ऊपर है और भगवान स्वर्ग में तो समान तो ऊपर से ही आयेगा ना। रीता के इस तर्क में दम तो था। इनमस्वरूप रीता को एक पांच का सिक्का नसीब हुआ। और पाण्डेय बाबू? ताश की एक और बाज़ी खेलने चल दिए।
2 हफ्ते बीत गए, अब तो समान ही बंधा जा रहा था। पंचायत के उपप्रमुख का साला खुद पाण्डेय बाबू का समान बांध रहा था। लेकिन उस दिन फिर वो लड़की दिखी, गीता रीता या जो भी। पाण्डेय बाबू को फिर खप्पर वाली बात याद आ गई। इतनी छोटी उम्र में ही ऐसे बेतुक मुहावरें क्यूं बोलने लगते है ये लेगांव के बच्चे? अब व्हेन इन रोम...
वैसे आज ताश बंद है। ईस्कूल की छत चू रही है और कल रात भयंकर बारिश हुई थी। पांडेय बाबू के क्वार्टर के बाहर सभी लड़कियां खोखो खेल रहें हैं। लेकिन ये मौसम तो चाय की फरमाइश करता है। पाण्डेय बाबू जेब से दस का नोट निकल के रीता को बुलाते हैं, वो चूल्हा जला के चाय बनाने में लग जाती है। चाय चढ़ाते हुए रीता कुछ बुदबुदाई
“ऊपर वाला जब भी देगा देगा छप्पर फाड़ कर।
उत्तरलेख
पाण्डेय बाबू को भांति में ही इस मुहावरे का पदार्थ ये ही समझ रहा था आज तक। नितिन नबीन के लिए डीके की हिदायत में जब इस अंग्रेज़ी अनुवाद होता है तब इसका अलसी अर्थ जाना, घर फर्श से छत तक भर जाएगा और इतना भरेगा कि शायद छत ही टूट जाए।