Don’t Play With Nooh अंग्रेज़ी शीर्षक वाली एक करीब करीब हिन्दी में लिखी गई कहानी है। लेखक (जो अज्ञात है कितनू प्रतिलिप्याधिकार एक असाद के पास है, अब जिसे जो सोचना है सोचे) के अनुसार वो ना तो हिंदी में निपुण है ना ही अंग्रेजी में, इसलिए ये ' हिंदुस्तानी' में लिखा जा रहा है। अगर हिन्दी उर्दू के बाद अंग्रेज़ी भी मिला दी जाए तो ज़रूर हिन्दुस्तानी है ये, लेकिन शायद हिंग्लिश कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। एक बार विश्वविद्यालयों की आधुनिक पंचमेल खिचड़ी का ज़िक्र किया था, वो ही बोली है इसमें। कहानी AMU की है, छाप तो है लेखन में। छपा हुआ देख कर ही महसूस होता है कि हमारी हिन्दी को कितना अटपटा कर दिया है अंग्रेज़ी ने। Cat तक हमे रोमनलिपि में अंग्रेज़ी में लिखना हो रहा है। लेकिन अच्छा या खराब, आज ये युवाओं की बोली में ही ये किताब है।
Notion Press से प्रकाशित है और स्वप्रकाशन की झलक साफ दिखती है त्रुटियों में । चन्द्रबिन्दु नहीं है कहीं भी, माना कि लोकाचार में पंचमाक्षर, अनुस्वार और अनुनासिक के उच्चारण में भिन्नता का लोप हो गया है (संभवतः आदिशंकराचार्य के भज गोविन्द के प्रभाव से), कहीं पे अर्धचंद्रबिंदु लिखा गया है और कहीं तो कुछ नहीं (अदर्शनं लोपः)। शकार के स्थान में षकार का प्रयोग है। जब पहेली पहेली बार विंडोज़ में देवनागरी लिखता था तो ऐसा ही होता था। आजकल तो आईआईटी कानपुर के WX notation से लिखता हूं। आखिर वैज्ञानिक बुद्धि ही काम आई। एक तरह से ये सारी त्रुटियां हिंदी भाषा के क्षय जिसका वर्णन ऊपर किया उसपे ही एक तरह की अनजाने में नाटकीय विडंबना है। बहुत इधर उधर मुंह मारने के बाद ये चुना है। और मोबाइल में तो गूगल कीबोर्ड सही है देवनागरी के लिए।
खैर महज़ भाषा से ही दिक्कत न थी मेरी, अन्यथा 10 पृष्ठ पढ़ के न छोड़ता किताब। खैर गम नहीं, सिर्फ 30 32 की किताब मिल गई थी ये मुझे।
गुमनाम लेखक (जो शायद असाद हो सकता है) की ये आपबीती कहानी है। वो वाचक भी है और एक पत्र भी। दोनों में भी काफी irritating सा महसूस होता है। बकौल स्नेप के "Insufferable know-it-all"।

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