ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
राष्ट्रकवि दिनकर कि इन पंक्तियों से एक तरफ में सहमत हूं। आज नववर्ष है, कम से कम अंग्रेज़ी कैलेंडर में देखे तो, लेकिन कुछ अलग आ नहीं लग रहा। "उमंग नहीं"। कैसे होगी? 31 से नाईजर जाना था। कोहरे से फ़्लाइट कैंसिल हो गई। कोहरा तो है दरअसल। अब तत्काल में रेल से जा रहें हैं। 2 को पहुंचेंगे, देरी हो यदि, जोकि इस मौसम में होगी ही, तो शायद कल का पैसा भी गया। 3 दिन का गया। अब गया सो गया, क्या ही कर सकते हैं? पैसों को तो हाथों का मैल कहा गया है (हे भगवान, इस साल हाथ और मैले के देना) लेकिन समय तो अनमोल है ना? 3 दिन नष्ट। स्वाहा। सोचा था न्यू ईयर में कुछ नया प्लेन बनेगा, जीवन बदल देंगे। सही पटरी पर अब अपनी गाड़ी चाहेली। करने का तो 2 को भी कर सकते हैं, लेकिन Fresh Start Effect भी एक चीज़ है। केवल दिमाग का खेल है ये तो, ये मात्र ज्ञान है, श्रवण है। इससे तो काम चलता नहीं। शास्त्रों में कहा ही गया है–
आवृत्तिः असकृदुपदेशात्
और हमने मनन कहां किया? खैर, शायद 4 तारीख, साल का पहला सोमवार और नए सेमेस्टर का पहला दिन एक अच्छी Fresh Start बन सकता हो।
नहीं कहूंगा कि न्यू ईयर से पूरी तरफ ताल्लुकात खत्म है मेरा। ये जो Wrapped जैसे data अलग अलग जगह आतें हैं उन्हें देखना बेहद पसंद है मुझे। संगीन का तो इधर भी साझा कर चुका हूँ, GR का आ गया लेकिन रेल में लिख न पाऊंगा। जाके एक और काम। लेकिन लिखना होगा। इस साल ने बहुत कुछ बदला है मुझमें।
लेकिन खबरदार, जब में साल खाता हूँ तो मेरा मतलब 2025 से नहीं बल्कि एक साल के अंतराल से है। यदि कल फैसला हो की अब ये से सब 18 अगस्त को होगा, तो भी कोई एतराज़ नहीं होगा। साल साल होता है। ईसा मसीह के जन्म या सम्राट विक्रमादित्य की ताजपोशी से गिनने की आकाशवता मालूम नहीं होती मुझे। इधर मेरा राष्ट्रकवि से मतभेद दिखता है। दिनकर कि माने तो
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
हालांकि दिनकर का अनुयाई हूँ मैं, किन्तु इधर न साथ दे सकूंगा। वहां रघुवीर सहाय की शरण में ही हूँ मैं।
रेल में हिंजड़े आए अभी। 200 का पत्ता गया। नया साल बनाना है इन्हें भी। आमतौर पर तो 10 20 का मामला होता है। कंगाली में आटा गिला रे दादा।
लेकिन सहाय का जो कहना था वो आज तो और भी aatik है। इंसान प्रगति के चक्कर से आउट ऑफ सिंक हो लगा है। तरक्की की ये कुर्बानी है। लेकिन मेरा निजी अनुभव में एक विरोधाभास है, प्रकृति के निकटतम में रांची अथवा जटनी मे नहीं बल्कि बैंगलुरु में पाता हूँ। और हां बैंगलुरु, बंगलौर नहीं, एक हफ्ते में विचार बदल गया मेरा। शायद प्रकृति का भी एक Laffer Curve है।
बात रही साल की तो, घंटा ही फ़रक न पड़े लेकिन जमाने का ऊसूल है तो, साल मुबारक!

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