17 November 2025

मदन महीने वाला जाड़ा आया

 ठंड आ गई है फिर से । लोग अक्सर जाड़े को मौत वगैराह से जोड़ते हैं, लेकिन मेरे लिए ये ही मदन महीना है। असल बसंत का अनुभव तो मुझे रघुवीर सहाय की भांति ही होता है ये 

और यह कैलेंडर से मालूम था
अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी
दफ़्तर में छुट्टी थी-यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आवेंगे
रंग-रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के
वे नंदन-वन होवेंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व
अभ्यास करके दिखावेंगे
सच कहा जाए तो दिल्ली में तो सारे ही मौसम ऐसे निकल जाते। इधर ओड़िशा आके ही थोड़ा इन सब पर गौर फरमाया जा रहा है। महानगरों में ये कहां ही संभव हो पाता है। नहीं, तो नहीं ही सही। ये एहसास अन्दर कुछ जगा देता है, लेकिन जीवन तो दिल्ली बंगलौर का ही भला है। इससे याद आया दिसंबर में एक वर्कशॉप के आई बंगलौर जाना है, उधर से आके घर दिल्ली भी । Stochastic PDE विष्य है। Prerequisites का अभावअनुभव कर रहा हूं अभी से । पीछे पलक्कड़ गया था, तब पूरा अनुभव हुआ था उसका । लेकिन इधर रहे के न सीखने से अच्छा तो उधर रह के न सीखना है ना । कर्मण्येवाधिकारस्ते । 

अब ये तो हुआ इस साल का । लेकिन मेरे लिए सच ही मदन महीना है ये । घर से 2023 से निकलने लगा । उसी साल मेट्रो में लाजपत नगर में चढ़ने वाली रेखा–नयनी थी। 2024 में वो टोपोलोजी वाली। 2025 में अभी हफ्ता भर की ही बात है, तो नहीं लिखूंगा। "डीडी" (अंग्रेजी में DD लिखे तो अच्छा लेकिन हिन्दी में अटपटा लग रहा है, लेकिन अब क्या कर सकते हैं) इस बार का भी देख के जान ली है। वही है जो जानती है, उन तीनों को खुद नहीं पता कि मेरे मदन महीने को सार्थक करके के लिए ये हीं रतिदाईं हैं । प्यार हुआ लेकिन कभी इजहार नहीं हुआ । अब, बकौल  दुष्यंत कुमार के:

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

अगर ग़ज़ल से नीचे आए, और मुन्ना भाई एमबीबीएस के वाफ़िक बोले तो -  फिर क्या अगले दिन अपने मोहल्ले में ऐश्वर्या आई । 

लेकिन टपोरी नहीं है हम और न ही मेरी शून्यप्रेमकथा के ऊपर आज उपदेश देने आया हूं मैं। निष्कर्ष ये ही की ठंड मेरे अंदर कुछ जगा देती है। विद्यालय में कुछ बारहमासी परंपरा वाली कविताएं थीं, उसमें ठंड का कैसे वर्णन था याद नहीं, लेकिन most likely मेरे ये विपरीत ही होगा । ठंड से याद आती है हर Saturday मसालेदार खिचड़ी की, जमे हुए नारियल तेल की और भारी गरम मुलायम रज़ाई के अंदर सोने की । 6 ऋतुएं में से ये ही मेरी मनपसंद है हालांकि 6 नहीं, 3 ही मानता हूँ मैं –गर्मी, जाड़ा और मानसून। भाई मुझे तो ठंड ही भली। 


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