ख़ामोश! अदालत जारी है [Khamosh! Adalat Jari Hai] by Vijay TendulkarMy rating: 1 of 5 stars
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ख़ामोश! अदालत जारी है [Khamosh! Adalat Jari Hai] by Vijay TendulkarMy rating: 1 of 5 stars
पहली बार इस नाटक का नाम मैंने गिरीश कर्नाड की Collected Plays: Tughlaq, Hayavadana, Bali: The Sacrifice, Naga-Mandala, Volume 1 में देखा था। दोनो हो नाटककार समकालीन थे, दोनों ने ही भारतीय नाटकों में नए नए प्रयोग लाए थे, और दोनों का तुलनातमक विश्लेषण करना एक तरह का फ़ैशन मालूम पड़ता है। दोनो ने ही अलग भाषाओं में नाटक लिखा था जिसका मैने अनुवाद ही ग्रहण किया।
मेरे मत में समानताएँ यहीं तक सीमित हैं। कर्नाड की रचनाएँ एक परंपरा से जुड़ी प्रतीत होती हैं, जो यक्षगान आदि से उनके काम को जोड़ती है; जबकि, तेंदुलकर का यह नाटक एक जर्मन उपन्यास Traps का ही मराठी रूपांतरण है। ये बात नहीं कि देशकालीकरण मुझे स्वीकार नहीं, Three Men (not) in a Boat: and most of the time without a dog एक अच्छी कोशिश थी Three Men in a Boat के जादू को फिर से दोहराने की, लेकिन ये अच्छे से नहीं किया गया इस बार।
अब शायद इसका कारण गर्भांक और अतिनाटकीयता रहा हो जो इसे अत्यधिक बोझिल के दे रहा है, या पात्रों का वार्तालाप अत्यधिक, किसी अधिक उपयुक्त शब्द के अभाव में कहूँ तो,‘ड्रामैटिक’ लगा हो। वैसे भी, यह माध्यम की एक स्वाभाविक सीमा हैये दिक्कत तो वैसे था माध्यम की ही है, ज्यादा होता नहीं कि नाटक पढ़ के मन में अच्छा लगता है। शायद कर्नाड का Shadi Ka Albam पढ़नी चाहिए आगे जब अनुधिक भारतीय नाटक पढ़ने का मन हो।
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