19 October 2025

पूर्ण समर्पण- एक हुंकार दीवार के आर-पार

मैं थूक के चाट लूँगा,
ख़ुद को ही डाँट लूँगा
 नहीं ये कारावास सहनीय,
कभी नस अपनी काट लूँगा।


तू है गरल स्वामिनी,
बिजली, वज्रा, दामिनी
न तनिक भी विषहीन,
क्षमा देहि हो सुकामिनी।


तोड़ दें ये हम दीवारें,
आत्मा जो मेरी मारे
 जान-जहान यदि बचे तो
ही सम्मान की आरती उतारें।


कैसे अब से तुम तक भेजें
अंतिम पासा बड़ा सहेजे?
 ये संधि, नहीं, पूर्ण समर्पण
मेरे विचार, चित्त, कलेजे।


नहीं आसान होता इतना,
सोच कोई भी लेगा जितना
नियाज़ी ने किया, किया था ग़ौरी ने
लेकिन शर एक है, एक है दिमाग़ बित्तना।


यदि तुम चाकू भोंक देती,
या दूध में विष घोल लेती,
|या होता बस एक द्वंद्व
तो फिर मेरा कुआँ, मेरी खेती।


पर नहीं हुआ ऐसा कुछ निर्दय अशिष्टाचार
न लगे जय घोष, न भरे गए कोई हुंकार
आख़िर सच ही कह गए हैं हम लोगों के पुरखे
जहाँ काम आए सुई, उधर क्या करे तलवार।


हाँ, आज तुम्हारी जय है
तेरा प्रेम ही अजय है
तू बहन मेरी थी, है,
मैं अंधा, तू मेरा संजय है। 

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