हमारे बीच एक काँच कि दिवार है
मनोवैज्ञानिक एक ये चमत्कार है
तुम्हे दिखत सिलैटी धातु
मुझे साफ़ साफ़ आर पार है |
हमारे बीच एक काँच कि दिवार है
सौ सुर्यें सहित समस्त संसार है
उषा विना रष्मी रहित रक्त रसित
इधर केवल शुन्य अन्धकार हे |
हमारे बीच एक काँच कि दिवार है
माना हम देख सकते आर पार है
किन्तु फायदा क्या ? कहा है तुम्ने
अन्ध, अन्धा ,आँधरा हुम तो लाचार हे |
No comments:
Post a Comment