19 October 2025

दिवार के पार तकरार

कल तुमसे हमने कहा
ये दीवार काफ़ी बड़ी है
कील इसपे जो है
हम दोनों को ही गढ़ी हैं | 

नहीं, केवल मुझपे ही ये
आघात हुआ है, चोट पड़ी है
तुम अन्धे हो, बहरे हो
चीखें निकलीं मेरी हर घड़ी हैं |

ये कह कर हमें तुमने दप्पत दिया
कि हमको तो बस अपनी ही पड़ी है
हाँ, माना तुम  फ्लोरेन्स् नाइटिंगेल्
तू रात दिन मेरे घाव देख खड़ी है |

"लेकिन अपनी पीड़ा अपने तक रखो"
मेरे इस विचार से तू चिढ़ी है
"दोस्त नहीं मानता है तू भाई"
ये रट तुझे ही तो पड़ी है ।


मन दबा कर, हमने दबे विचार
आज़ाद किए, फिर भी तू लड़ी है
हम घुट घुट चुप-चाप मर जाते
तुझे क्या "speak up" की पड़ी है?



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